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Thursday, June 21, 2018

Wilma Rudolph Story - एक लड़की के संघर्ष की सच्ची कहानी।



Wilma Rudolph Story - एक लड़की के संघर्ष की सच्ची कहानी।



दोस्तों यह कहानी एक ऐसी लड़की के बुलंद हौंसले की है जिसने अपनी जिन्दगी में कड़ी मेहनत और मुश्किलों भरा संघर्ष किया बल्कि हर मुसीबत को पार कर संसार के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी जी हां हम बात कर रहे हैं अमेरिका की एथलीट विल्मा रुडोल्फ कीWilma Rudolph Story

विल्मा रुडोल्फ का जन्म एक गरीब परिवार में सन 1939 में अमेरिका में हुआ था। विल्मा की माता जी एक सर्वेंट और उनके पिता जी एक कुली थे। मात्र चार वर्ष की आयु में विल्फ़ा को पोलियो ने अपनी चपेट में ले लिए था और उन्हें अपने पैरों में ब्रेस पहनने पड़ते थे डॉक्टरों के मुताबिक अब वो कभी भी चल नहीं सकेगी।

परन्तु विल्फा की माँ एक सकरात्मक सोच रखने वाली महिला थी। उन्होंने विल्मा का उत्साह कम नहीं होने दिया वो अक्सर विल्फा को कहती रहती थी के बेटा इस दुनिया में कुछ भी नामुमकिन नहीं हैं।  भगवान पर विश्वास ,कड़ी मेहनत और लग्न से तुम कुछ भी हासिल कर सकती हो।
विल्फ़ा ने अपनी माता से कहा माँ में एक तेज़ दौड़ाक बनना चाहती हूं।
अपनी माँ के उत्साह के फलसरूप विल्मा ने एक तेज़ दौडाक बनने का निश्चय कर लिया और उसने मात्र 9 वर्ष की उम्र में डॉक्टरों की सलाह के खिलाफ़ अपने ब्रेस को निकाल कर फेंक दिया और धीरे -धीरे चलने का अभ्यास करने लगी। उस समय वो बहुत बार चोटिल भी हुई परन्तु वो दर्द सहन करती रही परन्तु उसने हिम्मत नहीं हारी और लगातार प्रयास करती रही।

 आखिरकार एक -दो वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद वह अब आसानी से बिना किसी सहारे के चलने लगी थी।
इस तरह उसने 13 वर्ष की उम्र में पहली बार दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया जिसमें वो सबसे अंतिम स्थान पर आयीं इसके बाद उसने कई और दौड़ प्रतियोगितायों में हिस्सा लिया और वो आखरी स्थान पर आती रही परन्तु इसके बावजूद भी उसने हार नहीं मानी वो लगातार अभ्यास करती रही।

 आखिरकार एक ऐसा दिन भी आया जिसमें उसने दौड़ में पहला स्थान हासिल किया।

 लगभग 15 वर्ष आयु में उन्होंने टेनिसी स्टेट यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया वहां उसकी एड टेम्पल नाम के कोच के साथ मुलाकात हुई।
उसने कोच से कहा के ‘में  दुनिया की सबसे तेज़ दौड़ाक बनना चाहती हूं’
एड टेम्पल ने विल्मा के अंदर के जज्बे को देख उसे कोचिंग देने का निर्णय कर लिया इसके बाद उसने कड़ी मेहनत करना शुरू कर दिया
आखिरकार एक दिन ऐसा भी आया के विल्मा को ओलंपिक्स (Olympics) में भाग लेने का मौका मिल गया। ओलंपिक्स में विल्मा का सामना एक ऐसी दौडाक (Racer) से हुआ था जिसे अब तक कोई नहीं हरा सका था और जिसका नाम था युटा हीन (Jutta Hein)

उनकी पहली दौड़ थी 100 मीटर की जिसमें विल्मा ने युटा हीन को हराकर गोल्ड मैडल जीता इसके बाद 200 मीटर की दौड़ में भी विल्मा ने युटा हीन को हराकर गोल्ड मैडल जीता था।

इसके बाद 400 मीटर की रिले दौड़ शुरू हुई जिसमें सबसे तेज़ दौड़ने वाला एथलीट अंत में दौड़ता है इस रेस में विल्मा और युटा भी इस मुकाबले के आखिर में दौड़ रहीं थी आखिर दौड़ शुरू हुई पहले तीन एथलीट्स ने आसानी से बेटन (छड़ी ) बदल ली पर जब विल्मा के दौड़ने की बारी आई उससे बेटन (छड़ी ) छूट गई और विल्मा ने देखा की युटा हीन बड़ी तेज़ी दौड़ी चली आ रही है इसके बाद विल्मा ने गिरी हुई बेटन उठाई और मशीन की वातीं तेज़ी से दौड़ने लगी और उसने युटा को पीछे छोड़ते हुए उसे तीसरी बार हरा दिया और अपना तीसरा गोल्ड मैडल जीता।

कभी पोलियो से पीड़ित लड़की अब दुनिया की सबसे तेज़ दौड़ाक बन चुकी थी इसी तरह दोस्तों विल्मा रुडोल्फ ने अपनी जिन्दगी के हर पल से संघर्ष करते हुए कामयाबी हासिल की और दुनिया के लिए प्रेरणा बनी और साबित कर दिया के दुनिया में कुछ भी नामुमकिन नहीं है इसीलिए दोस्तों हमें कोशिशे करते रहना चाहिए आपको एक दिन मंजिल जरूर मिलेगी।

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