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Thursday, July 5, 2018

संगत का असर। sangat ka asar - prerak kahaniya


संगत का असर



एक अध्यापक अपने शिष्यों के साथ घूमने जा रहे थे | रास्ते में वे अपने शिष्यों के अच्छी संगत की महिमा समझा रहे थे | लेकिन शिष्य इसे समझ नहीं पा रहे थे | तभी अध्यापक ने फूलों से भरा एक गुलाब का पौधा देखा | उन्होंने एक शिष्य को उस पौधे के नीचे से तत्काल एक मिट्टी का ढेला उठाकर ले आने को  कहा |

जब शिष्य ढेला उठा लाया तो अध्यापक बोले – “ इसे अब सूंघो |”

शिष्य ने ढेला सूंघा और बोला – “ गुरु जी इसमें से तो गुलाब की बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है |”

तब अध्यापक बोले – “ बच्चो ! जानते हो इस मिट्टी में यह मनमोहक महक कैसे आई ? दरअसल इस मिट्टी पर गुलाब के फूल, टूट टूटकर गिरते रहते हैं, तो मिट्टी में भी गुलाब की महक आने लगी है जो की ये असर संगत का है और जिस प्रकार गुलाब की पंखुड़ियों की संगति के कारण इस मिट्टी में से गुलाब की महक आने लगी उसी प्रकार जो व्यक्ति जैसी संगत में रहता है उसमें वैसे ही गुणदोष आ जाते हैं |

इस शिक्षाप्रद कहानी से सीख मिलती है कि हमें सदैव अपनी संगत अच्छी रखनी चाहिए |

Sunday, June 24, 2018

हाइवे की चुड़ैल। Highway ki Chudail - Bhooto ki kahaniyan




हाइवे की चुड़ैल। Highway ki Chudail - Bhooto ki kahaniyan


सूरत के रहने वाले जिग्नेश पिछले साल नवरात के दिनों में कार ले कर अपने दोस्त दीपक के साथ सूरत से जामनगर आ रहे थे। रात के दो बजे होने के कारण रास्ता काफी सुनसान था।

गाड़ी 70 किमी की रफ्तार से दौड़ रही थी और गाड़ी में तेज़ म्यूज़िक बज रहा था। तभी अचानक गाड़ी से करीब 100 मीटर की दूरी पर एक खूबसूरत औरत लिफ्ट मांगने का ईशारा करते नज़र आई.

जिग्नेश गाड़ी चला रहा था जबकि दीपक उसके बगल में बैठा था। औरत को देखते ही जिग्नेश गाडी धीरे करने लगा…इसपर दीपक ने उसे टोका कि आजकल HIGHWAY पर इस तरह से गाड़ी रुकवाकर लूट-पाट की जा रही है। इसलिए तुम गाड़ी मत रोकना।
पर जिग्नेश नहीं माना, उसने औरत के बगल में जाकर गाड़ी रोक दी।

“कहाँ जाना है आपको”, जिग्नेश ने पुछा

“जामनगर”, औरत का जवाब आया।

जिग्नेश ने पीछे वाली सीट पर उसे बैठा लिया।

कुछ देर तक तो सब कुछ सामान्य रहा पर अचानक ही पीछे से उस औरत के हंसने की आवाज़ आने लगी…..

दीपक ने मुड़ कर के देखा तो उसके होश उड़ गए…और उसकी चीख निकल पड़ी
वो औरत दरअसल एक चुड़ैल थी…. उसने अपने लम्बे-लम्बे बाल आगे की तरफ झुका रखे थे…जिनके बीच से उसकी चमकती हुई डरावनी आँखें दिखाई दे रही थीं… उसके नाख़ून चाक़ू की तरह लम्बे थे और शरीर पर भी मर्दों की तरह बाल थे।

चीख सुनकर जिग्नेश ने फ़ौरन ब्रेक लगा दिया और गाड़ी खड़ी कर कूद कर भागने लगा…दीपक ने भी यही करना चाहा…लेकिन लाख कोशिश करने पर भी उसके साइड का दरवाजा नहीं खुला….कुछ देर बाद जब जिग्नेश कुछ गाँव वालों को लेकर गाड़ी के पास पहुंचा तो वहां सिर्फ गाड़ी खड़ी थी।

इस घटना के बाद दीपक का कभी कोई पता नहीं चला। जिग्नेश भी कुछ दिनों बाद अचानक से बीमार पड़ा और उसकी मृत्यु हो गयी।

पुलिस तफ्शीश में पता चला कि उस इलाके में हर साल उसी दिन के आस-पास इस तरह की एक घटना घटती है। जिसकी वजह आज तक कोई नहीं समझ पाया।

आलसी ब्राह्मण। Aalsi Brahman - Panchtantra Ki Kahani



आलसी ब्राह्मण। Aalsi Brahman - Panchtantra Ki Kahani


बहुत समय की बात है. एक गांव में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था. उसकी ज़िंदगी में बेहद ख़ुशहाल थी. उसके पास भगवान का दिया सब कुछ था. सुंदर-सुशील पत्नी, होशियार बच्चे, खेत-ज़मीन-पैसे थे. उसकी ज़मीन भी बेहद उपजाऊ थी, जिसमें वो जो चाहे फसल उगा सकता था. लेकिन एक समस्या थी कि वो ख़ुद बहुत ही ज़्यादा आलसी था. कभी काम नहीं करता था. उसकी पत्नी उसे समझा-समझा कर थक गई थी कि अपना काम ख़ुद करो, खेत पर जाकर देखो, लेकिन वो कभी काम नहीं करता था. वो कहता, “मैं कभी काम नहीं करूंगा.” उसकी पत्नी उसके अलास्य से बेहद परेशान रहती थी, लेकिन वो चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती थी. एक दिन एक साधु ब्राह्मण के घर आया और ब्राह्मण ने उसका ख़ूब आदर-सत्कार किया. ख़ुश होकर सम्मानपूर्वक उसकी सेवा की. साधु ब्राह्मण की सेवा से बेहद प्रसन्न हुआ और ख़ुश होकर साधु ने कहा कि “मैं तुम्हारे सम्मान व आदर से बेहद ख़ुश हूं, तुम कोई वरदान मांगो.” ब्राह्मण को तो मुंहमांगी मुराद मिल गई. उसने कहा, “बाबा, कोई ऐसा वरदान दो कि मुझे ख़ुद कभी कोई काम न करना पड़े. आप मुझे कोई ऐसा आदमी दे दो, जो मेरे सारे काम कर दिया करे.”
बाबा ने कहा, “ठीक है, ऐसा ही होगा, लेकिन ध्यान रहे, तुम्हारे पास इतना काम होना चाहिए कि तुम उसे हमेशा व्यस्त रख सको.” यह कहकर बाबा चले गए और एक बड़ा-सा राक्षसनुमा जिन्न प्रकट हुआ. वो कहने लगा, “मालिक, मुझे कोई काम दो, मुझे काम चाहिए.”
ब्राह्मण उसे देखकर पहले तो थोड़ा डर गया और सोचने लगा, तभी जिन्न बोला, “जल्दी काम दो वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.”
ब्राह्मण ने कहा, “जाओ और जाकर खेत में पानी डालो.” यह सुनकर जिन्न तुरंत गायब हो गया और ब्राह्मण ने राहत की सांस ली और अपनी पत्नी से पानी मांगकर पीने लगा. लेकिन जिन्न कुछ ही देर में वापस आ गया और बोला, “सारा काम हो गया, अब और काम दो.”
ब्राह्मण घबरा गया और बोला कि अब तुम आराम करो, बाकी काम कल करना. जिन्न बोला, “नहीं, मुझे काम चाहिए, वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.”

ब्राह्मण सोचने लगा और बोला,“तो जाकर खेत जोत लो, इसमें तुम्हें पूरी रात लग जाएगी.” जिन्न गायब हो गया. आलसी ब्राह्मण सोचने लगा कि मैं तो बड़ा चतुर हूं. वो अब खाना खाने बैठ गया. वो अपनी पत्नी से बोला, “अब मुझे कोई काम नहीं करना पड़ेगा, अब तो ज़िंदगीभर का आराम हो गया.” ब्राह्मण की पत्नी सोचने लगी कि कितना ग़लत सोच रहे हैं उसके पति. इसी बीच वो जिन्न वापस आ गया और बोला, “काम दो, मेरा काम हो गया. जल्दी दो, वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.”
ब्राह्मण सोचने लगा कि अब तो उसके पास कोई काम नहीं बचा. अब क्या होगा? इसी बीच ब्राह्मण की पत्नी बोली, “सुनिए, मैं इसे कोई काम दे सकती हूं क्या?”

ब्राह्मण ने कहा, “दे तो सकती हो, लेकिन तुम क्या काम दोगी?”
ब्राह्मण की पत्नी ने कहा, “आप चिंता मत करो. वो मैं देख लूंगी.”
वो जिन्न से मुखातिब होकर बोली, “तुम बाहर जाकर हमारे कुत्ते मोती की पूंछ सीधी कर दो. ध्यान रहे, पूंछ पूरी तरह से सीधी हो जानी चाहिए.”

जिन्न चला गया. उसके जाते ही ब्राह्मण की पत्नी ने कहा, “देखा आपने कि आलस कितना ख़तरनाक हो सकता है. पहले आपको काम करना पसंद नहीं था और अब आपको अपनी जान बचाने के लिए सोचना पड़ रहा कि उसे क्या काम दें.”
ब्राह्मण को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और वो बोला, “तुम सही कह रही हो, अब मैं कभी आलस नहीं करूंगा, लेकिन अब मुझे डर इस बात का है कि इसे आगे क्या काम देंगे, यह मोती की पूंछ सीधी करके आता ही होगा. मुझे बहुत डर लग रहा है. हमारी जान पर बन आई अब तो. यह हमें मार डालेगा.”
ब्राह्मण की पत्नी हंसने लगी और बोली, “डरने की बात नहीं, चिंता मत करो, वो कभी भी मोती की पूंछ सीधी नहीं कर पाएगा.”
वहां जिन्न लाख कोशिशों के बाद भी मोती की पूंछ सीधी नहीं कर पाया. पूंछ छोड़ने के बाद फिर टेढ़ी हो जाती थी. रातभर वो यही करता रहा.
ब्राह्मण की पत्नी ने कहा, “अब आप मुझसे वादा करो कि कभी आलस नहीं करोगे और अपना काम ख़ुद करोगे.”
ब्राह्मण ने पत्नी से वादा किया और दोनों चैन से सो गए.
अगली सुबह ब्राह्मण खेत जाने के लिए घर से निकला, तो देखा जिन्न मोती की पूंछ ही सीधी कर रहा था. उसने जिन्न को छेड़ते हुए पूछा, “क्या हुआ, अब तक काम पूरा नहीं हुआ क्या? जल्दी करो, मेरे पास तुम्हारे लिए और भी काम हैं.”
जिन्न बोला, “मालिक मैं जल्द ही यह काम पूरा कर लूंगा.”
ब्राह्मण उसकी बात सुनकर हंसते-हंसते खेत पर काम करने चला गया और उसके बाद उसने आलस हमेशा के लिए त्याग दिया.

सीख: आलस्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है. अपनी मदद आप करने से ही कामयाबी मिलती है और आलस करने से ज़िंदगी में बड़ी मुसीबतें आ सकती हैं.

अपनी कीमत पहचानो। apni keemat pahchano - prerak kahaniyan




अपनी कीमत पहचानो
 

एक आदमी ने भगवान बुद्ध से पूछा : जीवन का मूल्य क्या है?

बुद्ध ने उसे एक पत्थर दिया और कहा : जाओ और इस पत्थर का मूल्य पता करके आओ, लेकिन ध्यान रखना इसे बेचना नही है।

वह आदमी पत्थर को बाजार में एक संतरे वाले के पास लेकर गया और बोला : इसकी कीमत क्या है?
संतरे वाला चमकीले पत्थर को देख कर बोला- '12 संतरे ले जा और इसे मुझे दे दो।' 

आगे एक सब्जी वाले ने उस चमकीले पत्थर को देखा और कहा- 'एक बोरी आलू ले जा और इस पत्थर को मेरे पास छोड़ जा।'

वह आदमी आगे एक सोना बेचने वाले के पास गया और उसे पत्थर दिखाया। सुनार उस चमकीले पत्थर को देखकर बोला- 'मुझे 50 लाख में बेच दो।' 
उसने मना कर दिया, तो सुनार बोला- '2 करोड़ में दे दो या तुम खुद ही बता दो इसकी कीमत क्या है, जो तुम मांगोगे वह दूंगा।' 

उस आदमी ने सुनार से कहा- मेरे गुरु ने इसे बेचने से मना किया है।

आगे वह आदमी हीरे बेचने वाले एक जौहरी के पास गया और उसे वह पत्थर दिखाया। 

जौहरी ने जब उस बेशकीमती रूबी को देखा, तो पहले उसने रूबी के पास एक लाल कपडा बिछाया, फिर उस बेशकीमती रूबी की

परिक्रमा लगाई, माथा टेका।


फिर जौहरी बोला- 'कहा से लाया है ये बेशकीमती रूबी? सारी कायनात, सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती, ये तो बेशकीमती है।

वह आदमी हैरान-परेशान होकर सीधे बुद्ध के पास आया। अपनी आपबिती बताई और बोला- 'अब बताओ भगवान, मानवीय जीवन का मूल्य क्या है?


बुद्ध बोले- संतरे वाले को दिखाया उसने इसकी कीमत '12 संतरे' की बताई।
 सब्जी वाले के पास गया उसने इसकी कीमत '1 बोरी आलू' बताई।
 आगे सुनार ने इसकी कीमत '2 करोड़' बताई और जौहरी ने इसे 'बेशकीमती' बताया।

अब ऐसा ही मानवीय मूल्य का भी है। तू बेशक हीरा है..!! लेकिन, सामने वाला तेरी कीमत, अपनी औकात, अपनी जानकारी, अपनी हैसियत से लगाएगा।
घबराओ मत दुनिया में.., तुझे पहचानने वाले भी मिल जाएंगे।

Thursday, June 21, 2018

ठाकुर का उल्लू। thakur ka ulloo - hashya kahaniyan



रोचक हास्य कहानी – ठाकुर का उल्लू


बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक ठाकुर रहता था। ठाकुर का असली नाम सग्रांम सिंह था, पर उनका यह नाम बहुत कम लोग जानते थे। ठाकुर साहब के नाम से ही वे अपने इलाके में प्रसिद्ध थे।

ठाकुर साहब बड़े ठाठ बाट के आदमी थे। खाने पीने के बेहद शौकीन। जमीन काफी थी, पर उसकी आमदनी खाने पीने और ठाठ बाट में ही उड़ जाती थी।

ठाकुर साहब को पक्षी पालने का बड़ा शौक था। उनकी हवेली एक अच्छा खासा चिड़ियाघर बना हुआ था। इधर उधर पिंजरों में पक्षी लटकते नजर आते, इन पक्षियों में सबसे अधिक दर्शनीय एक उल्लू था, जो ठाकुर साहब को सबसे प्रिय था। वैसे देखने में उस उल्लू में ऐसी कोई विशेष्ता नहीं थी, पर ठाकुर साहब ने उसे एक विशेष आदत का अभ्यास करा दिया था। उनके आदेश पर वह सोने की गिन्नी को निगल जाता था और उनके आदेश देने पर गिन्नी को मुंह से उगल भी देता था। ठाकुर साहब ने उसे यहां तक अभ्यास करा दिया था कि वह एक बार में पांच गिन्नियां तक निगल जाता था और आदेशनुसार उन्हें एक एक कर उगल देता था। अपने उल्लू की इस विशेषता को ठाकुर साहब ने किसी को बताया नहीं थां
Rochak hasya kahani - kissa thakur ke ullu ka

ठाकुर साहब की एक पुत्री थी। उन्हें उसका विवाह अचानक तय करना पड़ा और विवाह की तिथि भी दस दिन आगे की ही निश्चत हो गई। बेटी का विवाह सिर पर और ठाकुर साहब  ठन ठन गोपाल, एक पैसा पास नहीं, समस्या विकट थी, पर वे घबराए नहीं। उन्होंने तय कर लिया कि बेटी की शादी निश्चत तिथि पर ही धूमधाम से होगी।

उसी गांव में एक साहूकार था, व्याज पर धन देता था। व्याज भी कस कर लेता था और मूल धन के बदले में कोई न कोई आभूषण गिरवी रख लेता था। ठाकुर साहब उसी साहूकार के पास गए और बोले, ”सेठ जी, मेरी बेटी का ब्याह सिर पर अचानक आ पड़ा है और आपके ही भरोसे मंजूर कर लिया है। कुछ मदद कीजिए।“

ठाकुर साहब की बात सुनकर साहूकार ने पूछा, कि ”कितना रूपया चाहिए, ठाकुर  साहब?“

ठाकुर साहब बोले, ”यही कोई दस हजार से काम चल जाएगा, सेठ जी।“

अब दस हजार तो उस जमाने में मायने रखते थे। सुनकर पहले तो साहूकरा चौंका, फिर कुछ सोचकर बोला, ”गिरवी रखने को क्या लाए हो ठाकुर साहब?“

गिरवी की बात सुनकर ठाकुर साहब चौंके, आश्चर्य से बोले, ”भाई, लाया तो कुछ नहीं, मैं तो लेने आया हूं। लेकिन क्या आपको मुझ पर विश्वास नहीं है, जो ऐसी बातें कर रहे हैं?“

साहूकार ने दलील दी, ”विश्वास आप पर और आपकी नीयत पर किसे नहीं होगा, पर व्यापार में विश्वास से ही काम नहीं चलता, लेन देन का काम अपने नियमों पर ही चलता है।“

यह सुनकर ठाकुर साहब कुछ देर तो असमंजस में पड़े रहे, फिर कुछ सोचकर बोले, ”ठीक है, सेठ जी, मेरे पास एक बहुमूल्य चीज है। हालांकि उसे मैं किसी कीमत पर भी नहीं देता, पर बेटी का ब्याह करना है, इसलिए मजबूरी में उसे ही मैं आपके यहां गिरवी पर रख दूंगा।“

बहुमूल्य चीज की बात सुनकर सेठ के मुंह में पानी भर आया। उत्सुकता से बोले, ”ऐसी कौन सी चीज आपके पास है?“

ठाकुर साहब ने धीरे से सेठ के कान में कहा, ”एक उल्लू है सेठ जी, सुनहरी उल्लू।“

सहूकार चौंककर बोला, ”उल्लू! सोने का उल्लू? कितने तोले का है?“

ठाकुर साहब बोले, ”सोने का बना हुआ नहीं, जीता जागता उल्लू है, सेठ जी।“

यह सुनकर सेठ हंसा और बोला, ”आप भी मजाक करते हैं ठाकुर साहब, मैंने तो समझा कि बीस तीस तोले का सोने का उल्लू होगा।“

अब ठाकुर साहब ने फुलझड़ी छोड़ी, बोले, ”अरे सेठजी, यह उल्लू सोने की एक गिन्नी रोज उगलता है।“

सोने की गिन्नी की बात सुनकर सेठ की आंखें खुलीं की खुली रह गई। ठाकुर साहब समझ गए कि तीर चल गया है। वे अपनी बात पर और जोर देते हुए बोले, ”हां सोने की गिन्नी, आप परीक्षा करके देख लीजिए।“
साहूकर मान गया। अगले दिन ठाकुर साहब उल्लू को पांच गिन्नियां खिलाकर साहूकार के यहां लाए। उल्लू को सामने बिठा कर कहा, ”उगल बेटा।“ और उल्लू ने एक गिन्नी उगल दी। दूसरे दिन भी ठाकुर साहब ने साहूकार के सामने एक गिन्नी उगलवाई और तीसरे दिन सेठ से कहा कि अब वे उल्लू को आदेश दें। उत्सुकता से भरा साहूकार बोला, ”उगल बेटा।“ और उल्लू ने एक गिन्नी उगल दी। सेठ का मन बल्लियों उछलने लगा। उसने तुरंत चांदी के दस हजार रूपये ठाकुर साहब के सामने रख दिए।

ठाकुर साहब ने रूपये थैली में भरे और जाते जाते बोले, ”सेठ जी, आपके ये दस हजार जल्दी ही लौटाकर अपना उल्लू ले जाऊंगा।“

सहूकार मुस्कराते हुए बोला, ”अरे ठाकुर साहब, कोई जल्दी नहीं है, आराम से लौटाइएगा।“

ठाकुर साहब चले गए।

सहूकार उल्लू के लिए एक खूबसूरत पिंजरा लाया और उसमें उसे बिठाकर अपने सोने के कमरे में टांग दिया। उल्लू के पेट में दो गिन्नियां बची थीं, अतः अगले दो दिन तो उसने गिन्नी उगली, किंतु तीसरे दिन साहूकार की खिलाई हुई रबड़ी उगल दी। जब दो तीन दिन तक वह रबड़ी उगलने का क्रम चला तो साहूकार घबराया और नौकर को भेजकर ठाकुर साहब को बुलवाया। ठाकुर ने आते ही कहा, ”कहिए सेठ जी, कैसे याद किया?“

सेठ झल्लाकर बोला, ”ठाकुर, तुमने मेरे साथ धोखा किया है।“

ठाकुर बोला, ”धोखा? मैंने क्या धोखा दिया आपको?“

सेठ ने गुस्से से कांपते हुए कहा, ”हां, तुमने धोखा दिया है। तुम बेईमान हो।“

अब ठाकुर ने साहूकार को घूरकर आंखें तरेरीं और बोले, ”मैं बेईमान हूं?“

ठाकुर के गुस्से को देखकर सेठ कुछ रूआंसा हो गया। कुछ सहमी आवाज में बोला, ”तुम्हारा उल्लू बेईमान है। वह तीन दिन से गिन्नी नहीं उगल रहा है।“

ठाकुर तो असलियत जानता ही था, मगर दिखावे के लिए पूछा, ”तो फिर क्या उगल रहा है?“

सहूकार ने माथा ठोक कर कहा, ”रबड़ी।“

सुनकर ठाकुर ने आश्चर्य प्रकट किया, फिर पूछा कि आपने उसे खिलाया क्या था?

सेठ जी ने बताया कि रबड़ी खिलाई थी।

यह सुनते ही ठाकुर ने ठहाका लगाया और बोला, ”रबड़ी खिलाई थी, तो उसमें उल्लू का क्या कसूर है? सेठ जी, आपने रबड़ी खिलाई थी, सो उसने रबड़ी उगल दी। गिन्नी खिलाते तो गिन्नी उगल देता। आखिर ठाकुर का उल्लू है। बेईमानी थोड़े ही करेगा। जो खाएगा वही तो उगलेगा।“ यह कहकर ठाकुर साहब खिलखिलाते हुए साहूकार के घर से बाहर निकल गए। सेठ उल्लू की तरफ और उल्लू सेठ की तरफ देखता रह गया।

भूतहा खजाना । bhutha khajana - bhooto ki kahaniyan



भूतहा खजाना । bhutha khajana



माने या ना मानें पर कहीं कुछ तो ऐसा है, जो रहस्यमय बना हुआ है। कुछ ऐसा जो कौतुहल पैदा करता है। कुछ सोचने-विचारने पर मजबूर करता है। क्या आपको नहीं लगता। कभी-कभी तो मुझे ऐसा लगता है कि इंसान की कल्पनाएँ हकीकत में बदल जाती हैं। जो कभी घटना रहती है, वही आगे चलकर कहानी में बदल जाती है। अगर इतिहास उसे अपने पन्नों में समेट लिया तो वे बातें, घटनाएँ सच्ची और अगर इतिहास के पन्नों में नहीं तो, बस काल्पनिक, कोरी कहानी की श्रेणी में आ जाती हैं, ऐसी बातें, घटनाएँ। कभी-कभी तो मुझे विज्ञान पर हँसी आती है, क्योंकि जो उसके सीमा में हैं, जो बातें, घटनाएँ, वस्तुएं, जीव आदि से वह परिचित है, उसे ही सत्य साबित करता है और बाकी चीजें उसके लिए काल्पनिक हैं, उसे विश्वास नहीं। तो क्या अगर विज्ञान जिन बातों, घटनाओं पर से पर्दा ना उठा पाए, उसे काल्पनिक मान लिया जाए? क्या विज्ञान की पहुँच की सीमा के अंदर की ही दुनिया वास्तविक है, और बाकी सब काल्पनिक? अजीब हाल है, विज्ञान, आखिर है क्या? धन्य है विज्ञान, जो बात उसकी समझ में आ जाती है, उसे वह वैज्ञानिक मान लेता है, बाकी कपोल कल्पना। सच्चाई यह है कि विज्ञान का ज्ञान सीमित है, ज्यों-ज्यों रहस्यों पर से परदा उठता जाता है, त्यों-त्यों विज्ञान उस वस्तु, घटना को लेकर अपने विचार बदलते हुए अपने ज्ञान का प्रसार करना शुरू कर देता है। यह वही विज्ञान है, जो तत्व, अतत्व के बँटवारे में उलझा हुआ है। कभी पानी को पानी बोलता है तो कभी बताता है कि यह H2O है। यह हाइड्रोजन और आक्सीजन का मिश्रण है। यह बात तो यह बताता है पर पानी नहीं बना सकता। विज्ञान भगवान को नहीं मानता पर एक छोटा सा जीव नहीं बना सकता, किसी को मौत के मुँह से नहीं बचा सकता पर कहता रहता है कि भगवान कुछ नहीं, विज्ञान ही भगवान है सब कहीं। विज्ञान को मानना गलत नहीं है पर विज्ञान जिन बातों, घटनाओं को समझ न पाए, जिन रहस्यों पर से परदा न उठा पाए, उसे कपोल-कल्पित भी कहना तो ठीक नहीं।

कहना तो नहीं चाहता था, पर अपने मित्र के साथ घटी एक छोटी घटना का जिक्र संक्षेप में कर रहा हूँ। मेरे दोस्त की पत्नी को एक चुड़ैल ने पकड़ लिया था। उसके पत्नी के हाव-भाव बदल चुके थे। वह पूरी तरह से कुछ अलग ही व्यवहार कर रही थी। मेरा दोस्त उस आत्मा से बातें करना चाहता था, बहुत कुछ जानना चाहता था, इसलिए उसने उसे एक कमरे में बैठाकर दरवाजे को अंदर से बंद करके बहुत कुछ सवाल-जवाब किए। मेरे मित्र ने उससे पूछा कि तूने इसे पकड़ा क्यों? यह तो बहुत ही पूजा-पाठ करती है। मेरे घर में भी कभी कोई बुरी आत्मा प्रवेश करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती, फिर तूँ कैसे आ गई? फिर उस चुड़ैल ने डरते हुए कहा कि ठीक है, दरअसल ये महिला निडर होकर भिनसहरे बाहर घूम रही थी और मैं भी उसी रास्ते से आ रही थी। मैंने इसे पकड़ना नहीं चाहा पर चूँकि यह अलवाती (जच्चा, हाल ही में जिसे नवजात हुआ हो) थी, इसलिए मैं अपने आप को रोक नहीं पाई। वैसे भी मैंने इसे पकड़ा नहीं है, बस मेरा छाया इसके ऊपर है। मैं डर रही हूँ, मैं इसे छोड़कर अभी चली जाती हूँ। फिर मेरे दोस्त ने कहा कि चली जाना, पर जाते-जाते तुम मेरे एक और प्रश्न का जवाब दे दो? फिर मेरे दोस्त ने पूछा कि सुना हूँ कि तुम आत्माओं के पास बहुत सारा धन होता है, हो तो दे दो ना मुझे, कुछ काम-ओम कर लूँगा और तेरा भी धन्यवाद कर दूँगा। तूँ बोलेगी तो तेरे लिए कोई यज्ञ-अनुष्ठान आदि करके तूझे मुक्त करा दूँगा। मेरे दोस्त की यह बात सुनते ही पहले तो वह चुड़ैल हँसी और फिर रोने लगी। रोते-रोते उसने कहा कि धन तो है मेरे पास, पर वह आपके किसी काम का नहीं। वैसे तो वह मेरे काम का भी नहीं है, पर पता नहीं क्यों मैं उसका मोह नहीं त्याग सकती। ऐसा क्यों है, मैं खुद ही समझ नहीं पाती। सच्चाई यह है कि हमारी भी कुछ पावंदियाँ हैं, कुछ बंदिशें हैं, मैं चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर पाती और न चाहकर भी बहुत कुछ कैसे कर देती हूँ, पता नहीं चलता। उस चुड़ैल की बातों से मेरे दोस्त को लगा कि यह सूक्ष्म दुनिया में रहते हुए भी स्वतंत्र नहीं है और चाहकर मुक्त भी नहीं हो सकती।

यह घटना सुनाने के पीछे मेरी धारणा यह है कि कहीं न कहीं कुछ ऐसी बातें, चीजें, घटनाएँ आदि हैं, जो रहस्यमय हैं और जिन्हें जान पाना, समझ पाना आसान नहीं। सबसे बड़ा भगवान ही है, ईश्वर ही है और जिस प्रकार हम भी उसी परम पिता के हाथ की कठपुतलियाँ हैं, वैसे ही अन्य जीव भी, सूक्ष्म जीव भी, अनन्त आत्माएँ भीं। पर यह भी सही है कि नकारात्मकता को सदा साकारात्मकता के आगे झुकना पड़ता है, सत्य असत्य पर विजयी होता है और बुरी आत्माएँ लाख चाहें पर उन्हें अच्छी आत्माओं के आगे नतमस्तक होना ही पड़ता है। यानी अगर ईश्वरत्व की बात करें तो वह अच्छाई, सच्चाई, साकारात्मकता का प्रतिनिधित्व करता है और यही कारण है कि अच्छे, सच्चे आदि लोगों से नकारात्मक चीजें, आत्माएँ दूर रहना ही पसंद करती हैं। जी हाँ और यही कारण है कि धार्मिक चीजें भी नकारात्मकता को दूर करती हैं और बुरी आत्माओं से रक्षा। इसलिए तो मूर्ति, शंख, गाय, तुलसी आदि का महत्व है और यह महत्व कथा पर आधारित नहीं है और ना ही कपोल-कल्पना है, अपितु यह हमारे पूर्वजों की अमूल अनुभव संपन्न देन है। हमें इसका मजाक न उड़ाते हुए इसे अपने जीवन में अपनाना चाहिए, सत्य की राह पर चलना चाहिए। झूठ, छल-कपट, बेइमानी आदि से बचना चाहिए, तभी सच्चे जीवन का आनंद मिलेगा।

मैंने सुन रखी है कि कुछ लोग ऐसे दैत्य-दानवों, भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं या अपने बस में रखते हैं, जो इनके काम आते हैं। जैसे पहले कुछ लोग दूसरे के कोठे का अनाज इन्हीं सब बुरी आत्माओं के सहारे अपने कोठे में करवा लेते थे। पर यह भी सच है कि बुरी आत्माओं को अपने अधीन में रखकर बुरे काम करवाने वाले लोग भी कभी चैन से नहीं रह पाते। उन्हें इसका खामियाजा भुगतना ही पड़ता है।

एक घटना सुनाता हूँ। हमारे जवार में एक पंडीजी थे। उनका एक बहुत बड़ा बगीचा था। वे कभी-कभी दोपहर में अपने इस बाग में गाय आदि लेकर चराने जाते थे और गाय को चरता छोड़ बाग में ही एक बड़े बरगद के नीचे अपनी अंगोछी बिछाकर सो जाते थे। फिर शाम को अपनी गाय को वापस लेकर घर आ जाते थे। पंडीजी काफी धार्मिक और सत्यवादी थे। वे कभी किसी का बुरा नहीं करते और बस काम से काम रखते। एक दिन पंडीजी अपनी अंगोछी बिछाकर गहरी नींद में उसी बरगद के नीचे सोए हुए थे। अचानक उनकी नींद खुल गई पर वे सोने का नाटक करते रहे। दरअसल उन्हें आभास हुआ कि वे जहाँ सोए हैं, वहां नीचे जमीन में कुछ तो खनखना रहा है। फिर वे सोने का नाटक करते हुए और सतर्क होकर आस-पास की चीजों आदि को सुनने की कोशिश करते हुए कनखी नजरों से इधर-उधर देखने की भी कोशिश करने लगे। अचानक उस बरगद के पेड़ पर उन्हें दो प्रेत बैठे हुए दिखाई दिए। वे दोनों प्रेत आपस में बात कर रहे थे और बात ही बात में वे दोनों आपस में लड़ बैठे। पंडीजी को कुछ बातें क्लियर हो रही थीं। दरअसल उनका झगड़ा वहाँ गड़े खजाने को लेकर था। एक प्रेत कहता था कि वह मेरा है और दूसरा कहता था कि मेरा। और वे दोनों प्रेत बरगद पर बैठे-बैठे ही अपनी शक्तियों के बल पर गड़े हुए धन को अपने अधीन करने की कोशिश कर रहे थे, जिसके चलते पंडीजी के सोए हुए जमीन के नीचे से खनखनाहट की आवाज आ रही थी। एक प्रेत तो बोल पड़ा कि जब से ये पंडीजी इस जगह पर सोना शुरू किए हैं, खजाना भी डरने लगा है और मैं भी। दरअसल अगर खजाना काफी दिन तक जमीन में गड़ा रह जाए तो उसपर आत्माओं का वास हो जाता है या उस खजाने में भी इतनी शक्ति आ जाती है कि वह इधर-उधर आ-जा सकता है या अपने हिसाब से जिसे चाहे मालामाल कर सकता है।

पंडीजी, सोए ही सोए कुछ दुर्गा मंत्र बुदबुदाए। उस मंत्र के प्रभाव से वे दोनों प्रेत पंडीजी के पास खींचे चले आए। पंडीजी ने उन दोनों से कहा कि डरो मत। मैं तुम्हें तुम्हारे इस योनि से छुटकारा दिलवा सकता हूँ, अगर तुम लोग तैयार हो तो? उनमें से एक प्रेत बहुत ही ढीठ था, वह पहले पंडीजी को डराना चाहा पर पंडीजी हँसते हुए अपने मंत्रों के उच्चारण से उसे कितनी ही बार उठा-उठाकर पटक दिए और उसे जलाने की धमकी देने लगे। अंततः मरता क्या न करता, वह प्रेत पूरी तरह से शांत हो गया और पंडीजी के हाँ में हाँ मिलाने लगा। फिर पंडीजी ने कहा कि तुम लोग अपनी जीवनी बताओ, अपना नाम आदि। मैं गया में जाकर तुम लोगों के लिए पिंडदान करूँगा। प्रेत तैयार हो गए और साथ ही वहाँ गड़े धन को पंडीजी को सौंपना चाहे। पर अरे यह क्या वे लोग ज्योंही धन निकालने की कोशिश किए उन्हें तो मुँह की खानी पड़ी। उस खजाने की खनखनाहट बड़ गई और वो अपनी शक्ति से इन दोनों प्रेतों पर भारी पड़ गया। देखते ही देखते वहाँ जमीन से दो चाँदी के बटुले निकल आए, जिसमें खजाना था। वे दोनों बटुले हवा में उड़ते हुए उन प्रेतों पर वार करने लगे। पंडीजी आराम से बैठकर बटुलों और उन प्रेतों के युद्ध को देखते रहे। अंत में बटुले उन प्रेतों के हाथ नहीं ही लगे और वे प्रेत थक-हार कर हाँफते हुए पंडीजी के पास आकर बैठ गए। फिर अचानक वे बटुले भी शांत होते हुए वहीं धरती में समा गए। वे प्रेत कातर नजरों से पंडीजी की ओर दिख रहे थे और अपनी असहाय स्थिति के लिए शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। फिर अचानक पंडीजी बोल पड़े, कोई बात नहीं तुम लोग इस खजाने को काबू में नहीं कर पाए और बेकार में इसके लिए लड़ रहे थे। चलो, मैं इसे काबू में करके ही दम लूँगा। इसके बाद पंडीजी उठे, वहीं पास में एक पलास के पेड़ से एक पतली टहनी तोड़ें। फिर कुछ मंत्र बुदबुदाते हुए उस टहनी से उस जगह पर एक गोल घेरा बना दिए, जहाँ बटुले गड़ गए थे। दरअसल पंडीजी ने मंत्र से उस स्थान को बाँध दिया था, यानी वह खजाना अब वहाँ से इधर-उधर नहीं जा सकता था।

अब तो हर दिन पंडीजी सुबह-सुबह ही नहा धोकर उस बगीचे में आते और उस खजाने के ऊपर कुछ पूजा-पाठ आदि करते। दरअसल पंडीजी पूजा-पाठ करके पहले उस धन को शांत करना चाहते थे ताकि उसे आसानी से प्राप्त किया जा सके। लगभग 51 दिन तक लगातार पूजा करने के बाद पंडीजी को लगा कि अब इस खजाने को निकाला जा सकता है। एक दिन भिनसहरे वे कुदाल लिए और बगीचे में पहुँचकर उस खजाने को निकाल लिए।

लोग तो कहते हैं कि उस खजाने से पंडी जी ने कई कुएँ आदि खुदवाए, गाँव में एक स्कूल भी बनवाए और साथ ही गरीब-गुरबों की मदद किए। इतना ही नहीं पंडीजी गया भी गए और गया जाकर पिंडदान करके उन दोनों प्रेतों को मुक्त कराए। पंडीजी जब तक रहे उस धन का सही उपयोग करते रहे। पर उनके मरने के बाद उनके बेटे से उस धन से अपने लिए बहुत कुछ करना चाहा पर वह संभव नहीं हो पाया। वह पूरी तरह से बरबाद हो गया और उसकी बरबादी के पीछे यह धन ही था। आज पंडीजी के कुछ वंशज ठीक-ठाक हैं पर उस बगीचे में उस बरगद के आस-पास की जगह पर एक मंदिर बनवा दिए हैं। आज न वह बगीचा है और न ही वह बरगद का पेड़ पर पुरनिया लोगों की यादों में वे पंडीजी और यह खजाना आज भी अपने अस्तित्व को बनाए हुए हैं।

Wilma Rudolph Story - एक लड़की के संघर्ष की सच्ची कहानी।



Wilma Rudolph Story - एक लड़की के संघर्ष की सच्ची कहानी।



दोस्तों यह कहानी एक ऐसी लड़की के बुलंद हौंसले की है जिसने अपनी जिन्दगी में कड़ी मेहनत और मुश्किलों भरा संघर्ष किया बल्कि हर मुसीबत को पार कर संसार के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी जी हां हम बात कर रहे हैं अमेरिका की एथलीट विल्मा रुडोल्फ कीWilma Rudolph Story

विल्मा रुडोल्फ का जन्म एक गरीब परिवार में सन 1939 में अमेरिका में हुआ था। विल्मा की माता जी एक सर्वेंट और उनके पिता जी एक कुली थे। मात्र चार वर्ष की आयु में विल्फ़ा को पोलियो ने अपनी चपेट में ले लिए था और उन्हें अपने पैरों में ब्रेस पहनने पड़ते थे डॉक्टरों के मुताबिक अब वो कभी भी चल नहीं सकेगी।

परन्तु विल्फा की माँ एक सकरात्मक सोच रखने वाली महिला थी। उन्होंने विल्मा का उत्साह कम नहीं होने दिया वो अक्सर विल्फा को कहती रहती थी के बेटा इस दुनिया में कुछ भी नामुमकिन नहीं हैं।  भगवान पर विश्वास ,कड़ी मेहनत और लग्न से तुम कुछ भी हासिल कर सकती हो।
विल्फ़ा ने अपनी माता से कहा माँ में एक तेज़ दौड़ाक बनना चाहती हूं।
अपनी माँ के उत्साह के फलसरूप विल्मा ने एक तेज़ दौडाक बनने का निश्चय कर लिया और उसने मात्र 9 वर्ष की उम्र में डॉक्टरों की सलाह के खिलाफ़ अपने ब्रेस को निकाल कर फेंक दिया और धीरे -धीरे चलने का अभ्यास करने लगी। उस समय वो बहुत बार चोटिल भी हुई परन्तु वो दर्द सहन करती रही परन्तु उसने हिम्मत नहीं हारी और लगातार प्रयास करती रही।

 आखिरकार एक -दो वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद वह अब आसानी से बिना किसी सहारे के चलने लगी थी।
इस तरह उसने 13 वर्ष की उम्र में पहली बार दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया जिसमें वो सबसे अंतिम स्थान पर आयीं इसके बाद उसने कई और दौड़ प्रतियोगितायों में हिस्सा लिया और वो आखरी स्थान पर आती रही परन्तु इसके बावजूद भी उसने हार नहीं मानी वो लगातार अभ्यास करती रही।

 आखिरकार एक ऐसा दिन भी आया जिसमें उसने दौड़ में पहला स्थान हासिल किया।

 लगभग 15 वर्ष आयु में उन्होंने टेनिसी स्टेट यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया वहां उसकी एड टेम्पल नाम के कोच के साथ मुलाकात हुई।
उसने कोच से कहा के ‘में  दुनिया की सबसे तेज़ दौड़ाक बनना चाहती हूं’
एड टेम्पल ने विल्मा के अंदर के जज्बे को देख उसे कोचिंग देने का निर्णय कर लिया इसके बाद उसने कड़ी मेहनत करना शुरू कर दिया
आखिरकार एक दिन ऐसा भी आया के विल्मा को ओलंपिक्स (Olympics) में भाग लेने का मौका मिल गया। ओलंपिक्स में विल्मा का सामना एक ऐसी दौडाक (Racer) से हुआ था जिसे अब तक कोई नहीं हरा सका था और जिसका नाम था युटा हीन (Jutta Hein)

उनकी पहली दौड़ थी 100 मीटर की जिसमें विल्मा ने युटा हीन को हराकर गोल्ड मैडल जीता इसके बाद 200 मीटर की दौड़ में भी विल्मा ने युटा हीन को हराकर गोल्ड मैडल जीता था।

इसके बाद 400 मीटर की रिले दौड़ शुरू हुई जिसमें सबसे तेज़ दौड़ने वाला एथलीट अंत में दौड़ता है इस रेस में विल्मा और युटा भी इस मुकाबले के आखिर में दौड़ रहीं थी आखिर दौड़ शुरू हुई पहले तीन एथलीट्स ने आसानी से बेटन (छड़ी ) बदल ली पर जब विल्मा के दौड़ने की बारी आई उससे बेटन (छड़ी ) छूट गई और विल्मा ने देखा की युटा हीन बड़ी तेज़ी दौड़ी चली आ रही है इसके बाद विल्मा ने गिरी हुई बेटन उठाई और मशीन की वातीं तेज़ी से दौड़ने लगी और उसने युटा को पीछे छोड़ते हुए उसे तीसरी बार हरा दिया और अपना तीसरा गोल्ड मैडल जीता।

कभी पोलियो से पीड़ित लड़की अब दुनिया की सबसे तेज़ दौड़ाक बन चुकी थी इसी तरह दोस्तों विल्मा रुडोल्फ ने अपनी जिन्दगी के हर पल से संघर्ष करते हुए कामयाबी हासिल की और दुनिया के लिए प्रेरणा बनी और साबित कर दिया के दुनिया में कुछ भी नामुमकिन नहीं है इसीलिए दोस्तों हमें कोशिशे करते रहना चाहिए आपको एक दिन मंजिल जरूर मिलेगी।